प्रश्न पूछने की आजादी क्या है एक बड़ी आजादी?

हम एक स्वतंत्र देश में रहते हैं लेकिन बहुत कम लोग ही ऐसे हैं जो स्वतंत्र देश में रहने का आनंद खुलकर उठाते हैं। कुछ लोग यही सोचते हैं कि यहां सवाल पूछना लोकतंत्र के उद्देश्य को नाकाम कर देगा… याद रखें कि सरकार तुच्छ मुद्दों में उलझाकर हम आम नागरिकों को गुमराह करती ही रहेगी। यही नहीं, जनता के अज्ञान को अपने स्वयं के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए उपयोग बखूबी किया जाएगा।

हालांकि संवैधानिक लोकतंत्रों के गठन में इसका जवाब साफ छिपा हुआ है। संसदीय लोकतंत्र आज भी इस बात पर रश्क करते हैं कि उसके नुमाइंदे अपने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल कर सकते हैं।

इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र के एक से अधिक मॉडल विकसित हो चुके हैं… लेकिन इनके तहत आजादियों में गहरा फर्क पड़ा है। रूस हो या फिर सिंगापुर…  चुनाव सब जगह होते हैं लेकिन सरकार से सवाल पूछने की वैसी आजादी आपको कहीं नहीं मिलेगी जो आपको ब्रिटेन, अमेरिका या भारत में देखने को मिलेगी। इसलिए अचरज नहीं कि जैसे ही सोशल नेटवर्क फैले, भाषाएं आड़े नहीं आईं और उन देशों ने इन्हें सबसे तेजी से अपनाया जिनमें लोकतंत्र नगण्य या फिर सीमित थी।

बात जब इक्कीसवीं सदी की चल रही है तो अब चुनाव की आजादी ही लोकतंत्र नहीं है, चुने हुए को सवालों में कसते रहने की आजादी अब सबसे बड़ी लोकशाही है इसलिए जैसे ही सोशल नेटवर्क फैले, लोगों ने समूह में सवाल पूछने प्रारंभ कर दिए हैं।

याद रखें कि अच्छा सवाल लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सवाल पूछना हमें कम देशभक्त नहीं बनाता है। एक अच्छा सवाल सरकार के पक्ष में नहीं होना चाहिए लेकिन राष्ट्र की भलाई के समर्थन में ज़रूर से होना चाहिए।

प्रश्नों का तंत्र अब पूरी तरह लोकतांत्रिक हो रहा है… आखिर क्यों केवल पत्रकार ही कठोर सवाल पूछें???  लोकतंत्रों में अब ऐसी संस्कृति विकसित करने का मौका आ गया है जब प्रत्येक व्यक्ति को सरकार से कठोर से कठोर प्रश्न पूछने को अवश्य प्रेरित किया जाए।

यही नहीं, सत्ता का यह भ्रम प्रतिक्षण ज़रूर से टूटते रहना चाहिए कि जो उत्सुक या जिज्ञासु हैं, वह मूर्ख नहीं हैं… और कई बार सवाल, जवाबों से कहीं ज्यादा मूल्यवान होते हैं।

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